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माना जाता है कि यह ज़ियारत इमाम महदी (अ.स.) द्वारा 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रति शोक प्रकट करने के लिए पढ़ी गई थी। इस ज़ियारत में इमाम हुसैन (अ.स.) के शरीर पर लगे ज़ख्मों, उनके साथियों की शहादत और इमाम के परिवार (अहल-ए-बैत) पर हुए अत्याचारों का विस्तार से वर्णन है।
यह इमाम हुसैन के साथ अपनी वफादारी और ज़ालिमों के खिलाफ खड़े रहने की प्रतिज्ञा को दोहराती है।
ज़ियारत अल-नाहिया अल-मुक़द्दसा के पाठ को मोटे तौर पर दस मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:
مصائبِ کربلا کا واسطہ دے کر مانگی جانے والی دعائیں کبھی رد نہیں ہوتیں۔ مشکل ترین وقت میں اس زیارت کا ختم بہت مجرب مانا جاتا ہے۔ ziyarat e nahiya in hindi
ज़ियारत-ए-नहिया अल-मुक़द्दसा (Ziyarat-e-Nahiya al-Muqaddasa)
ज़ियारत-ए-नाहिया एक "मुतलक़" (पूर्ण) ज़ियारत है, जिसका अर्थ है कि इसे किसी भी समय पढ़ा जा सकता है। हालाँकि, इसे विशेष रूप से आशूरा (मुहर्रम की 10 तारीख) के दिन पढ़ना अत्यधिक मुस्तहब (प्रशंसनीय) है। इसका हिंदी में अनुवाद और ऑडियो कई एप्लीकेशन और वेबसाइटों पर उपलब्ध है, जिससे हिंदीभाषी लोगों के लिए इसे समझना और पढ़ना आसान हो गया है।
Ziyarat-e-Nahiya (the Pilgrimage of the Sacred Side) is a deeply moving and tragic salutation traditionally attributed to the 12th Imam, Imam Mahdi (atfs) , regarding the tragedy of Karbala. Key Features of Ziyarat-e-Nahiya Authorship and Origin Imam Mahdi (atfs)
इस ज़ियारत को पढ़ने से इमाम हुसैन (अ.स.) के साथ रूहानी ताल्लुक (आध्यात्मिक संबंध) मजबूत होता है।
इमाम महदी (अ.त.फ़.श.) इमाम हुसैन (अ.स.) के अंतिम क्षणों, उनकी शहादत की पीड़ा, और उनके घोड़ों (ज़ुलजनाह) की स्थिति का ग्राफिकल वर्णन करते हैं।
इस लेख में, हम के अर्थ, इसके गहरे संदेश और इसके महत्त्व के बारे में विस्तार से जानेंगे। उनकी शहादत की पीड़ा
यह ज़ियारत सिखाती है कि हक़ (सत्य) के लिए हर तरह की मुसीबत का सामना कैसे किया जाए।
5. ज़ियारत-ए-नाहिया कब और कैसे पढ़ें?
ज़ियारत-ए-नाहिया सिर्फ एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि कर्बला की त्रासदी और उसके सन्देशों से जुड़ने का एक जीवंत और शक्तिशाली माध्यम है। यह इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों के बलिदानों को याद करने, उनके दुश्मनों से घृणा करने और उनके आदर्शों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने का एक पवित्र अवसर प्रदान करती है। इसके पाठ से विश्वासियों के हृदय में अल्लाह और उसके संतों के प्रति प्रेम, ज्ञान और समर्पण की भावना विकसित होती है।
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